Friday, May 19, 2017

महल छोड़कर मोहब्बत की महारानी बनीं जापान की माको

प्यार के लिए राजमहल छोड़ना ही पड़ता है

इस देश में प्यार की ताकत देखिए फिल्म बाहुबली -2 ने अपनी प्रेम कहानी के दम पर सिर्फ 19 दिन में डेढ़ हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई कर ली । फिल्म का नायक अपनी प्रेमिका के लिए अपनी राजगद्दी को ठोकर मार देता है । सिर्फ अपने वचन के लिए ,अपने प्यार को अपना बनाने के लिए वो अपनी प्रेमिका के लिए अपने शत्रु का नौकर बनना स्वीकार कर लेता है । 
भारतीय फिल्मों में प्रेम का तड़का उतना ही पुराना है जितना इसका इतिहास । बाहुबली -2 की प्रेम कहानी में कोई नवीनता नहीं थी ऐसा हम सैकड़ो फिल्मों में पहले भी देख चुके हैं लेकिन शायद प्रेम में सुख की निरंतरता कुछ ऐसी है कि किरदारों के बदल जाने के साथ ही वही पुरानी कहानी, वही पुराने गीत वही पुरानी परिस्थितियां नये शब्दों के साथ नये सुरों से संवर कर एक नयी ताजगी का अहसास करा देती हैं। 
इधर भारत के लोग सिल्वर स्क्रीन पर बाहुबली को अपने देवसेना के लिए राजगद्दी छोड़ते देख रहे हैं तो उधर जापान में  रियल लाइफ में वहां की जनता ऐसा होते हुए देख रहे हैं ।  25 साल की जापान की राजकुमारी माको अपने प्यार को पाने के लिए शाही रूतबे को छोड़ रही है  क्योंकि जापान के राजघराने के नियमानुसार अगर शाही परिवार का कोई सदस्य किसी आम आदमी से शादी करता है तो उसे राजघराना छोड़ना होता है। 
माको की मुलाकात पांच साल पहले अपने साथ पढ़ने वाले केई से होती है और फिर दोनों के बीच मोहब्बत के फूल कुछ यूं गुलजार होते है कि राजकुमारी माको एक साधारण इंसान केई के लिए अपना महल छोड़ने का फैसला ले लेती हैं । राजकुमारी माको अपने शाही रुतबे को छोड़ने में पल भर की भी देरी नहीं करती ,उन्हें कुछ और सोचना नहीं पड़ता ।  
आखिर इस प्यार में ऐसा क्या हैं कि महल,  मिट्टी सा लगने लगता है,  शाही रुतबा, मोहब्बत के अहसासों के सामने बौना हो जाता है । एक प्यार को पाने के लिए सारा सुख, सारा वैभव, सारी विलासिता छोड़ने की धुन कैसे सवार हो जाती है ?  प्रेमियों ने तो वक्त पड़ने पर खुद के वजूद को छोड़ दिया है । इतिहास ऐसी प्रेमकहानियों से भरा पड़ा है कि जरूरत पड़ने पर आशिकों ने प्राण तक छोड़ दिया और बदले में प्रेम को पकड़ लिया । 
जिन संतों ने प्रेम को समझा वो कहते हैं कि "ढाई आखर प्रेम का पढ़े से पंडित होय",  किसी कवि ने समझा तो लिखा "मोहब्बत अहसासों की पावन सी कहानी है, कभी कबिरा दीवाना था  तो कभी मीरा दीवानी है"  इसे किसी शायर ने समझा तो लिखा ' 'ये तो एक आग का दरिया है और डूब के जाना है'   किसी दार्शनिक ने प्रेम का समझा तो कहा कि ये तो दो जिस्मों के एक जान होने का रसायन शास्त्र है ।
वाकई प्रेम के ऐसे अनुभव को पाने के मामले में जापान की राजकुमारी माको को खुशनसीब ही माना जाएगा  क्योंकि वो सिर्फ राजसी रूतबा छोड़ रही है और बदले में वो केई के दिल की रानी बन जाएगी । भारत में ये सुख तो राधा रानी को भी नहीं मिला । कृष्ण और राधा एक होने को तरसते रह गये । लेकिन द्वारका की गद्दी को संभालने के चक्कर में कृष्ण से वृंदावन की राधा की छूट गईं । 
 सीता ने राम को पाने के लिए नंगे पैर चौदह साल का वनवास झेला , सीता और राम की जोड़ी आदर्श तो बन गई लेकिन राजमहल की मर्यादा निभाने के लिए जंगल में जाकर पुत्रों को जनम देना पड़ा । मोहब्बत में शाही रुतबा जान ले लेता है राजस्थान की हाड़ा रानी ने अपना सिर काट पर राजा को  तश्तरी में भेज दिया ताकि मोहब्बत उनकी ताकत बन जाये और वो राजधर्म का पालन कर सकें । काश! औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसा अपने प्रेमी , जो उनके पिता के सिपहसलार थे ,उस अकलाक खान के लिए महल छोड़ने का साहस जुटा पाती लेकिन वो ऐसा नहीं कर सकीं और बाकी की जिंदगी अपने प्रेमी की कब्र पर लोटते हुए गुजार दी। 
तो प्यार में राजमहल की बाधा सदियों पुरानी है  जिन्होंने राजमहल का मोह पाला वो ताउम्र अकेले महल की दीवारों में सिर पीटते अपने प्रेमी की याद में घुट- घुट कर जिये । और जिन लोगों ने महल छोड़ दिया वो प्रेम को प्रमाणित कर सके । वाकई जापानी की 25 साल की राजकुमारी माको इतिहास के इन किरदारों से  बहुत ज्यादा खुशनसीब है जिन्होंने केई के प्यार के सामने राजमहल की परंपराओं को छोड़ दिया, ठुकरा दिया  । अब वो प्रेम की उस दुनिया में प्रवेश करने वाली है जिसमें वो सिर्फ दुनिया को देने की स्थिति में है । 
माको असली महारानी तो अब बनेंगी क्योंकि दुनिया प्यार की भूखी है, प्यार को तरस रही है  और माको अब इस मोहब्बत के सल्तनत की मल्लिका । 

Thursday, May 18, 2017

नये भारत के लिए नये लीडर्स की खोज शुरू, मोदी के सपनों को करेंगे साकार

 रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी, मुंबई (ठाणे) का अभिनव प्रयोग

मौजूदा दौर में जितने भी लीडर्स ने स्वयं को प्रमाणित किया है उनमें से ज्यादातर वो लोग है  जिन्होंने परिस्थितियों के अनुरूप खुद को तराशा, खुद संघर्ष किया, और खुद ही अपना लक्ष्य तय किया और फिर उस रास्ते पर बढ़ने के लिए तन, मन और धन सब कुछ झोंक दिया । लेकिन इसके बावजूद लाखों लोग ऐसे थे जिनमें प्रतिभा थी, क्षमता थी, उन्होंने अपना सर्वस्व दांव पर भी लगाया लेकिन वो ना तो खुद का भला कर सके, ना ही समाज और राष्ट्र को उनका लाभ मिल पाया । कहीं कुछ कमी रह गई और गाड़ी पटरी से उतर गई ।
वर्तमान दौर में भी अगर आप अपने चारों तरफ नजर दौड़ाएंगे तो पाएंगे कि कई लोग भाषण देने की कला में माहिर होते हैं लेकिन अध्ययन पूरा नहीं होता और वो सीमित हो कर रह जाते हैं । कई लोगों में समाज सेवा की भावना होती है, अच्छे समाजसेवी होते है लेकिन फिर भी दिशाहीन होते हैं उनका दायरा बड़ा ही नहीं हो पाता  और कई तो ऐसे होते है जिसने पास नेतृत्व की सारी खूबियां होती है लेकिन उनके पास संपर्क नहीं होता, जिसकी कमी के चलते  अवसर तैयार नहीं हो पाता और वो हताशा और कुंठा में जीने को मजबूर हो जाते हैं।
लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा क्योंकि भारत विश्व मंच पर हर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी एक महाशक्ति के तौर पर स्थापित करने को छटपटा रहा है । इसके लिए उसे देश में मौजूद मानव प्रतिभा का पूरा पूरा इस्तेमाल करना चाहता है ।  भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति से स्पष्ट झलकता है वो भारत को दुनिया के शीर्ष देशों की श्रेणी में देखना चाहते हैं और उसके लिए उन्हें भविष्य में ऐसे लीडर्स की जरूरत होगी जिनके पास समझ को प्रमाणित करने का आचरण हो । पूरी तरह से  शिक्षित, स्किल्ड और अनुभव से भरे लोग चाहिए जिनमें विजन को हासिल करने का विश्वास हो ।
भारत के वर्तमान और भविष्य को इस मांग को मुंबई से संचालित संस्था रामभाऊ म्हालगी ने भांप लिया है और वो जुट गई है ऐसे युवाओं की खोज कर उनका निर्माण करने में । इस दिशा में  नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में देश के मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, आरएमपी संस्थान के अभिनव पाठ्यक्रम "पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम इन लीडरशिप, पॉलिटिक्स और गवर्नेंस" को लांच करते हुए खुद को  बेहद रोमांचित महसूस कर रहे थे । उन्होंने अपने युवा दिनों को याद करते हुए कहा कि काश इस तरह शिक्षा उन्हें भी मिल पाती । जावड़ेकर ने कहा कि अब राजनीति में वो दौर आएगा जब लोग आसानी से इस पर ऊंगली नहीं उठा पाएंगे । विश्वास की राजनीति का वातावरण और मजबूत होगा ।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेटिक लीडरशिप ( आईआईडीएल ) के तले शुरू हो   रहे इस अनूठे पाठ्यक्रम को  राज्यसभा सांसद और आरएमपी के वाइस चेयरमैन विनय सहस्त्रबुद्धे ने पूरी तरह से वैज्ञानिक सम्मत बताया । उन्होंने भरोसा दिलाया कि हम ऐसे युवाओं का निर्माण करने जा रहे हैं  जिनमें राजनीति से लेकर समाज के हर क्षेत्र में काम करने की विशेष दक्षता होगी । उनका व्यापक दृष्टिकोण भारत के आनेवाले को कल को समृद्ध करेगा ।
आरएमपी के कार्यकारी निदेशक रवींद्र साठे ने बातचीत के दौरान बताया कि पिछले 35 सालों से हम नेतृत्व साधना जैसे साप्ताहिक कार्यक्रमों के जरिए प्रतिभावान युवाओं को तराशने का काम कर रहे थे और उसके नतीजे से उत्साहित होकर ही हमने नौ महीने के व्यापक पाठ्यक्रम को युवाओं को देने का संकल्प लिया है, साठे को उम्मीद है कि काबिल लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में हमारा ये पाठ्यक्रम आशा का केंद्र साबित होगा ।
कोर्स के प्रमुख देवेंद्र का दावा है कि हमने "पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम इन लीडरशिप, पॉलिटिक्स और गवर्नेंस" को इस तरह से डिजाइन किया है कि युवा को जितना पुस्तकीय ज्ञान होगा उससे ज्यादा हम उसे व्यवहारिक बनाने पर जोर देंगे ।
कार्यक्रम में मौजूद देश के पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी , बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव पी मुरलीधर राव और जेएनयू की प्रोफेसर अमिता सिंह ने भी संस्थान के इस प्रयास की सराहना कर बधाई दी ।
तो जिन युवाओं को अपने विज़न को व्यहारिकता में अपनाने की ललक है और वो इस पाठ्यक्रम को अपनाना चाहते हैं तो आईआईडील के इस बेवसाइट  - www.iidl.org.in;  आरएमपी वेबसाइट - www.rmponweb.org पर जाकर विस्तृत जानकारी ले सकते हैं ।

Monday, May 8, 2017

क्या अब गोरखपुर की पुलिस अधिकारी चारू निगम पर गाज गिरेगी?

कब तक खुलकर बोलने वालों पर बर्खास्तगी और निलंबन की तलवार लटकती रहेगी?

सवाल ये है कि इस देश में सच को कहने का मैकेनिज्म क्या है ? फिर सच को सुनने का तरीका क्या है? फिर सच से सच को समाधान में कैसे बदला जाये? जिसमें न्याय की भावना निहित हो , न्याय ऐसा हो जिसमें हर पक्ष को तृप्ति मिले । मेरी समझ से तो उसका एक ही सिद्धांत है, एक ही समाधान है और वो है हर हाल में सच को परिभाषित और प्रकाशित किया जाय ।
हाल ही की सिर्फ तीन घटनाओं से हम इस देश में सत्य और न्याय की गति, स्थिति और परिणाम को जानने की कोशिश करते हैं । हाल ही का एक  मामला है बीएसफ के तेजबहादुर का,  फेसबुक  पर खराब खाने की शिकायत  लिखी तो नौकरी चली गई । एक और मामला है छत्तीसगढ़ की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे का, फेसबुक पर आदिवासियों पर हो रहे पुलिसिया जुल्म की दास्तान लिखी और वो नौकरी से निलंबित हो गईं ।
अब तीसरा मामला है गोरखपुर की अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक चारू निगम का । स्थानीय  विधायक से सरेआम बेज्जती झेलने के बाद चारू ने फेसबुक पर लिखा है कि "मेरे आँसुओं को मेरी कमज़ोरी न समझना, कठोरता से नहीं कोमलता से अश्क झलक गए. महिला अधिकारी हूँ, ये तुम्हारा गुरूर न देख पाएगा, सच्चाई में है ज़ोर इतना अपना रंग दिखलाएगा." इस मामले में स्थिति और गति के बाद परिणाम की प्रतीक्षा है ।
पुलिस अधिकारी चारू निगम और स्थानीय विधायक के बीच हुई बातचीत और गर्मा-गरमी के वीडियो से एक बात तो स्पष्ट हो गईं कि विधायक जी नेतागीरी कर रहे थे और चारू अपना काम ।  कानून व्यवस्था से बेपरवाह हो विधायकजी सिर्फ और सिर्फ अपनी तेरतर्रार छवि का पोषण कर रहे थे । सीधे- सीधे समझ में आ रहा था कि कैसे विधायक, पुलिस प्रशासन के काम में दखलंदाजी करते हैं  और इस हद तक करते हैं कि पुलिस की आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं ।
अब समाज, राजनीति और मीडिया, पुलिस- प्रशासन के आंसुओं का हिसाब लगाने बैठती है,  आंसुओं के पीछे के सच को खोजती है तो प्रथम दृष्टया यही समझ में आता है कि लोकतंत्र में जब तक नेता तमाशा नहीं खड़ा करेगा तब तक उसकी तथाकथित हैसियत ही स्थापित नहीं होगी।
भारत जैसे  लोकतांत्रिक देश में  नेता इस बात का फायदा उठाते हैं कि भीड़ अगर आपके साथ है तो आप सीधे -सीधे चौराहे में खड़े होकर  संविधान को चुनौती दीजिए, कानून झाड़िये क्योंकि विधानसभा और संसद के सत्र तो आप लोग स्थगन की भेंट चढ़ा आते हैं ।  फिर बीच सड़क पर खड़े होकर पुलिस -प्रशासन को झुकने के लिए मजबूर कीजिए । फिर चाहे  हालात को बिगाड़िये, चाहे बनाइये,  बस कैसे भी करके सुबह के अखबार में सुर्खियां हो जाइये ।
दिलचस्प ये है कि जिस कार्यपालिका को आप जलील कर रहे हैं उसके आंसू निकाल रहे हैं दरअसल को वो व्यवस्था आप से ही निकली है लेकिन समस्या ये है कि आप विधायक बन कर खुश नहीं है आप प्रशासन भी बनना चाहते हैं । तभी तो विधायकजी  गोरखपुर में बीच-बाजार में चौधरी बन बैठे ।
लेकिन विधायक जी उस महिला पुलिस अधिकारी ने अपने आंसुओं का हिसाब मांगा है और सीधे- सीधे आपके गुरूर को ललकार है वो भी सच की दुहाई देकर । अब आपके समर्थक आपको उकसायेंगे कि साहब!  चारू निगम को संस्पेंड नहीं करवाया तो आपकी साख पर बट्टा लगना तय है  और एक व्यक्ति की व्यक्तिगत साख के चक्कर में विधायिका और कार्यपालिका दोनों की साख दिन -ब -दिन गिरती जा रही है।  यही इस देश में परंपरा सी स्थापित हो गई हैं ।
अगर हमारे पास सच को जानने, समझने का व्यवहारिक मैकेनिज्म होता तो छत्तीसगढ़ की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को संस्पेंड करने की जरूरत नहीं पड़ती । वर्षा डोंगरे ने तो वहीं लिखा जो उन्होंने महसूस किया। उनके मुताबिक उन्होंने आदिवासियों के साथ पुलिस की अमानवीयत को खोलकर रख दिया । अगर वो सच कह रही है तो उसके मूल में जाने की जरूरत थी लेकिन सिस्टम का सारा फोकस समाधान से ज्यादा पुलिस की साख बचाने का का था ।  क्या वर्षा के सस्पेंशन से समस्या खत्म हो गईं ?
ठीक इसी तरह सीमा सुरक्षा बल के जवान तेजबहादुर की शिकायत में हमने शायद समाधान नहीं खोजा बल्कि सारा ध्यान सीमा सुरक्षा बल की साख को बचाने में लगा दिया । समाधान में गये होते तो तेजबहादुर की नौकरी शायद नहीं जाती ।
लेकिन सवाल ये है कि हम कब तक फेसबुक पर बोलते चारू, वर्षा और तेजबहादुर जैसे लोगों को संस्पेंड और बर्खास्तगी के दायरे में लाते रहेंगे ? अगर किसी दिन ये आंदोलन बन गया तो ..। अब भी वक्त है संभल जाइये फेसबुक पर उठती इन आवाजों को नज़रअंदाज मत करिए, इनकी बातों को समझिए औऱ इनका समाधान प्रस्तुत करिए वर्ना किसी दिन आप इस भीड़तंत्र में अपनी ही पैदा की हुई अराजकता का शिकार बन सकते हैं ।
http://tz.ucweb.com/5_Dq2B - (यूसी में प्रकाशित लिंक )