Sunday, May 7, 2017

केजरीवाल एक आंदोलन के कातिल साबित होकर ना रह जाएं!



मुझे लगता है भारत के राजनीतिक इतिहास में केजरीवाल एक ऐसा नाम होंगे जिसमें ना तो उनके शौर्य का वर्णन होगा, ना उनकी असफलता का  बल्कि उन्हें जाना जाएगा सत्ता हासिल करने के लिए अपनाये उनके मैकेनिज्म के लिए । लोकतंत्र पर  शोध करनेवालों के लिए दिल्ली की केजरीवाल सरकार से वो सूत्र निकलते हैं जिससे सत्ता हथियाने के सारे शॉर्टकट मौजूद  हैं ।

अन्ना और केजरीवाल के आंदोलन से एक बात तो साफ हो गई थी इस देश के लोग राजनीति में ईमानदारी चाहते थे  । प्रशासन में पारदर्शिता चाहते थे ।  जिस आदर्श को अब तक लोगों ने किस्से कहानियों में पढ़ा था उस आदर्श को सच में बदलते हुए देखने का लोगों में जुनून पैदा हो गया था ।

अन्ना और केजरीवाल  आंदोलन से एक बात और साफ हो गई थी कि भारत की राजनीति में शुचिता स्कोप अभी बाकी था । बिना धन बल के, बिना बाहुबल के भी आप सरकार बना सकते हैं ।  बस एक बार लोगों को आपने यकीन दिला दिया कि आप सच्चे हो, और इस सच्चाई को आपने स्वयं के साथ प्रमाणित कर दिया तो  लोगों को तख्ता पलटते देर नहीं लगेगी । लोकतंत्र की ताकत का प्रतीक बन कर उभरी थी अरविंद केजरीवाल की सरकार ।

आज केजरीवाल की सरकार लोकपाल की बात भी नहीं करती,  लेकिन जनता के दिल में जगह लोकपाल ने ही बनाई थी । लोग  लोकपाल की टोपी पहन कर सड़क पर उतरे थे  । बच्चे, बूढ़े, जवान, नवयुवतियां, घरेलू और कामकाजी महिलाए,  पहली बार दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर का आदमी, नौकरीपेशा लोग, ऑटो रिक्शा, रेहड़ी चलाने वाले लोग , जाति-पाति को पीछे छोड़ कर उतर गये थे सड़क पर । मानो शुचिता की बारात सजी हो ।  ऐसा लगा कि स्थापित राजनीतिक दलों की सोशल इंजीनियरिंग वाली राजनीति का युग पीछे छूट जाएगा ।

क्या आंदोलन था, अन्ना गांधी जैसे लगने लगे थे, केजरीवाल नेहरू जैसे । आजादी के बाद गांधी कांग्रेस का पैकअप चाहते थे क्योंकि आजादी मकसद पूरा हो गया था । लेकिन नेहरूजी और उनके साथियों ने ऐसा होने नहीं दिया ।  उसी तरह अन्ना देश में शुचिता के आने तक आंदोलन की राजनीति को आगे रखना चाहते थे लेकिन केजरीवाल और उनके समर्थकों ने ऐसा होने नहीं दिया ।

आंदोलन का लोहा गर्म था केजरीवाल ने मार दिया हथौड़ा । लोकपाल को पीछे छोड़ा और एक सत्याग्रही से रातोंरात सरकार बन बन बैठे । अब तक हमने देखा था कि कैसे भोगवादी दुनिया में , बाजारवादी दुनिया  में सपने बेचें जाते है लेकिन पहली बार लोकतंत्र में ईमानदारी, शुचिता, पारदर्शिता और लोकपाल का सपना  दिखाया गया और सपने का विज्ञापन  सुपरहिट साबित हुआ ।

" ना पैसा लगा ना कौड़ी,  केजरीवाल और उनके साथी चढ़ गये सत्ता की घोड़ी "

लेकिन दो साल में वो सब हो गया जिसके लिए राजनीति जानी जाती है । कलंक भी लगा । कद भी घटा । विश्वसनीयता चली गई । अपने पराये हो गये । पद, प्रतिष्ठा और अहंकार बड़े हो गये जिसने भी टांग अड़ाने की कोशिश की उसे ही रास्ते से उड़ा दिया गया ये भी नहीं देखा कि कभी ये आपके सपनों का हिस्सा था । सपनों के प्लानर थे । सपने को सच करने के मैकेनिज्म में आपके भागीदार थे ।

भागीदार बिखरने लगे तो वो बिलबिलाने लगे । वो बिलबिलाने लगे तो "आप"की पोल खुलने लगी । पोल खुलने लगी तो "आप"की साख पे पलीता लगने लगा । पलीता लगने लगा तो पब्लिक को आप से ज्यादा खुद पर  गुस्सा आने लगा । गुस्सा आया तो दिल्ली के एमसीडी के नतीजे आये और आपको "आप"की हैसियत बता दी ।

लोगों समझ गये कि सादगी से भरा आपका पहनावा, शालीनता से भरा आपका आचरण, पारदर्शिता की ताल ठोंकनेवाली आपकी बातें सब एक टूल थे , वो सब एक दिखावा था। लोग अब कहने लगे है कि सच्चाई का, ईमानदारी का, शुचिता का मायाजाल बुना गया था  सिर्फ मतदाताओं को झांसा देने के लिए  ।

अगर आपका लक्ष्य नेक होता,  एक होता तो साथियों में मतभेद की कोई गुंजाइश ही नहीं थी । अगर जनता की भलाई ही सर्वोपरि होती तो सुप्रीमो बनने का गुरूर परिलक्षित ही नहीं होता ।

केजरीवाल सरकार के दो साल हो गये और दो साल में आप वो छाप नहीं छोड़ सके जो अन्ना के साथ रहकर आपने स्थापित किया था । जी- जान से काम करने की बजाय आप कमियां गिनाते रह गये । आप सिर्फ शिकायत खोजने में लगे रहे ।  उंगलिया उठाते रह गये । सारी उर्जा आपने दिल्ली की जनता की भलाई के बजाय अपने राजनीति कद को बड़ा बनाने में लगा दिया वो भी सामनेवाले को नीचा दिखाकर । कभी ममता के साथ, तो कभी लालू के साथ ,  कभी पंजाब का चक्कर और कभी गोवा की सैर ।

 ना खुदा मिला ना बिसाले सनम । लगता है अब "आप" हो गये खतम

ठीक है आपने जो किया सो किया अपने राजनीतिक संस्कारों के हिसाब से किया । लेकिन इतना जरूर बता दिया कि देश में ईमानदारी का स्कोप अभी बाकी है । लोग राजनीति में शुचिता चाहते हैं । लोग सत्य, प्रेम और न्याय को प्रमाणित होते देखना चाहते हैं ।

"आप"ने भले ही उस जनआंदोलन का गला घोंट दिया हो, उस परिवर्तन की आंधी का कत्ल कर दिया हो  लेकिन उम्मीद अभी बाकी है क्योंकि  भारत की जनता को अभी भी उसका इंतजार है जिसकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं होगा और वो भारत के  लोकतंत्र में एक दिन लोकपाल को साकार जरूर करेगा ।



Friday, May 5, 2017

एंटी -रोमियो अभियान में लगे पुलिस की हकीकत को तो जान लीजिए योगीजी!

एक कांस्टेबल की जबानी यूपी पुलिस की कहानी                                                                                                                                                                        

उत्तर प्रदेश में योगी राज है, माहौल ऐसा बन गया है जैसे कानून का राज लौट आया हो,  यूपी में अब चोरी, लूटपाट छेड़खानी जैसी घटनाएं बंद हो जाएंगी । इस सिलसिले में मेरी यूपी पुलिस के एक अधिकारी से बात हुई तो उन्होंने बिना किसी लाग -लपेट के साफ- साफ कह दिया चाहे कोई आ जाए जैसा चलता आया था वैसा ही चलता रहेगा ।

उस पुलिस अधिकारी ने साफ -साफ कहा कि किसी सरकार में इतनी हैसियत नहीं कि अव्यवस्था के इस गठजोड़ का खात्मा कर दे । अधिकतम अपराध नेता और पुलिस की सहमति से ही होते रहे हैं ।  हां! अगर सरकार चाहती है तो अधिकतम 8 से 10 प्रतिशत मामला सुधरा हुआ बाहर से लगेगा  लेकिन भीतर से जैसा था वैसा ही रहेगा ।

यूपी में क्यों नहीं सुधर सकता सिस्टम इस उत्सुकता में मेरी मुलाकात हाल ही में वहां के एक ऐसे कांस्टेबल से हुई जिसने पुलिस के आला -अधिकारियों की नाक में दम कर रखा हैं । उस शख्स की बातें सुनी तो लगा जैसे हाथी के नाक के चींटी घुस गई हो । उस शख्स से हुई पहली बातचीत का ब्यौरा मैं आपके सामने रख रहा हूं जिसे सुनकर आप भी कहेंगे ये कांस्टेबल तो किसी भी दिन मारा जाएगा । 

कांस्टेबल का नाम है सुशील कौशिक । इस वक्त ये कांस्टेबल क्षेत्राधिकारी औद्योगिक नोएडा में पदस्थ है । इसकी शिक्षा एमए और एलएलएम है । कौशिक की कहानी करवट लेती है 2005 से जब ये नोएडा 49 थाने में पदस्थ था । कौशिक ने देखा कि कैसे वहां के  पुलिसवाले बांग्लादेशी मजदूरों के उठा लाते हैं और उन्हें तब तक परेशान करते हैं जब तक इन्हें लानेवाला ठेकेदार पुलिस को एक निश्चित रकम नहीं दे देता । 

इस कांस्टेबल ने वहां चल रहे कबाड़ी और खाकी के गठजोड़ को भी उजागर किया । जिसमें कबाड़ी निर्माणाधीण बिल्डिंगों के बिल्डिंग मटेरियल को चुराते थे और उसमें पुलिस को एक निश्चत हिस्सा मिलता था । जब कौशिक ने इसके लिए  जिम्मेदार अधिकारियों की नामजद शिकायत दर्ज करवाई तो बजाय आरोपियों की जांच होने के कौशिक का ही ट्रांसफर नोएडा से सीधे झांसी कर दिया गया ।  

साल 2005 -06 में झांसी में रहते हुए सुशील कौशिक ने पाया कि कैसे चुनाव ड्यूटी में लगे पुलिस कर्मचारियों का पैसा आला अधिकारी डकार रहे हैं । इस बार कौशिक ने पूरी जानकारी आरटीआई से हासिल की और बाकायदा यूपी होम सेक्रेटरी और डीजीपी से की । धारा 156-3 के तहत मामले को लेकर कोर्ट में भी गये । आईजी को इस मामले में जांच करनी पड़ी और मामला आज भी एंटी करप्शन कोर्ट में चल रहा है । लेकिन कांस्टेबल कौशिक को झांसी के रीलीव करके बुलंदशहर भेज दिया गया ।

साल 2007 में कौशिक ने   बुलंदशहर में फिर आरटीआई लगाई कि कैसे चुनाव में लगे पुलिसवालों का पैसा अधिकारी डकार रहे हैं । मामले की जांच शुरु हुई लेकिन गाज गिरी कांस्टेबल पर । कौशिक का तबादला बुलंदशहर से बागपत हो गया । बागपत में कौशिक ने कुछ ऐसा किया कि पूरी यूपी पुलिस हिल गई । 

कौशिक ने देखा पुलिस कर्मचारियों के वेतन से बिना उनकी स्वीकृति के 50 रुपये कटता था और उसका इस्तेमाल होता था एसएसपी आवास में लगे जनरेटरों में तेल डालने के लिए । यहां उन्होंने पाया कि सालों से एक परंपरा बन गई थी कि पुलिस कर्मचारियों की सैलेरी से बिना उनकी स्वीकृति के पुलिस कल्याण, डिसट्रिक्ट एमीनिटी फंड, शिक्षा, खेलकूद और मनोरंजन के नाम पर 30 रुपये काट लिया जाता था । 

जब कौशिक ने इस बात पर आपत्ति की तो उनको लाइन हाजिर कर दिया गया  और अधिकारी ने उनकी गोपनीय रिपोर्ट तैयार कर उन्हें बागपत से फैजाबाद ट्रांसफर कर दिया । इस मामले को लेकर कांस्टेबल ने जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो राज्य के 5 आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज हो गया । 

ये कांस्टेबल जहां जाता वहीं के अधिकारियों की कलई खोलने में लग जाता था । साल 2010 में इसने फैजाबाद के एसपी के खिलाफ जब मोर्चा खोला तो हमेशा की तरह इनका ट्रांसफर फैजाबाद से नोएडा कर दिया गया । नोएडा आकर कांस्टेबल ने देखा कि मामूली सैलरी पाने वाले पुलिसवालों ने करोड़ों रुपये की बेनामी संपत्ति बना रखी है। कौशिक ने इसे उजागर करने के लिए आरटीआई लगा रखी है और जवाब का इंतजार कर रहे हैं ।

कांस्टेबल कौशिक ने अपने स्तर पर भी ,अपना पैसा खर्च करके उन पुलिसवालों की संपत्ति का ब्यौरा इकहट्टा कर रहे हैं जिनकी करोड़ों रुपयों की बेनामी संपत्ति है  और उन्हें इंतजार है अगले ट्रांसफर का । 

योगीराज में कौशिक का अगला ट्रांसफर ये तय करेगा कि प्रदेश में क्या में राज बदला है या फिर व्यवस्था भी बदली है ? योगी उस पुलिस से भ्रष्ट्राचार को साधने में ताकत लगा रहे है जो खुद उसका हिस्सा मालूम पड़ रहा है । कांस्टेबल कौशिक ने पुलिस के भीतर के कई ऐसे भन्नादेने वाले खुलासे किये जिसके सामने  पेशेवर अपराधी शरीफ लगता है । कांस्टेबल का कहना है कि जिस पुलिस के दम पर योगीजी एंटी रोमियो अभियान चला रहे हैं पहले उन पुलिसवालों की हकीकत तो पता कर लेते ।    

कुल जमा कहानी इतनी ही मालूम पड़ती है कि सरकारें आएंगी जाएंगी लेकिन अव्यवस्था का गठजोड़ अपने पूरी गुंजाइश के साथ फलता- फूलता रहेगा और सुशील कौशिक जैसे कांस्टेबलों का ट्रांसफर होता रहेगा ।     

 ( ये लेख कांस्टेबल सुशील कौशिक से बातचीत के आधार पर लिखा गया है )  

Thursday, May 4, 2017

भौतिकशास्त्री स्टीफन हॉकिंग की धरती के खत्म होने की चेतावनी को गंभीरता से लें

धरती बचाने के लिए मानव जाति को मानव का आविष्कार करना होगा 

धरती को बचाने की एकमात्र उम्मीद है भारत का मानव व्यवहार दर्शन और विज्ञान 


मानव जाति अगर मानव को खोज ले तो दूसरी धऱती खोजने की जरूर ही नहीं पड़ेगी। अगर मानव अपने मौलिक आचरण के साथ मिल गया तो सारी समस्याओं का समाधान मिल जाएगा। सारे सुखों की खोज हो जाएगी। लेकिन उसके लिए दुनिया के तमाम विद्वानों को अपने अहंकार को किनारे रखकर भारत की परंपराओं में शोध करना होगा।
जिस दिन ताकतवर देशों का अहंकार टूटेगा उस दिन ये धरती स्वर्ग हो जाएगी। मानव देवता हो जाएगा और पूरा विश्व परिवार हो जाएगा। भारत की परंपरा हजारों सालों से वसुधैव कुटुंबकम की ओर इशारा कर रही है लेकिन दुर्भाग्य कि विज्ञान अपने अधूरेपन से उबर ही नहीं पा रहा है।
भारत का वैदिक दर्शन, भारत का परंपरागत ज्ञान और विज्ञान आज इसलिए प्रासंगिक हो गया है क्योंकि दुनिया के महान भौतिकशास्त्री स्टीफन हॉकिंग ने पूरी मानवजाति को आगाह करते हुए कहा कि खुद को बचाए रखने के लिए सभी मानव 100 साल के भीतर पृथ्वी को छोड़कर अन्य किसी ग्रह पर चले जाएं। उन्होंने ये बात जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी और उल्का पिडों के टकराव से पैदा होने वाले हालात से बचने के लिए कही है।
हॉकिंग की इस बात से ये स्पष्ट हो गया कि जो विज्ञान मानव को सुख नहीं दे सकता, जिस विज्ञान में जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी और उल्का पिंडों के टकराव को रोकने की हैसियत ही नहीं हैं उसे कम के कम अब ये स्वीकार कर लेना चाहिए कि प्रकृति को, अस्तित्व को जानने की उसकी समझ ही विकसित नहीं हो सकी है।
बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘एक्पेडिशन न्यू अर्थ’ में स्टीफन हॉकिंग और उनके स्टूडेंट क्रिस्टोफ गलफर्ड बाहरी दुनिया में मानव जाति के लिए जीवन की तलाश करते नजर आएंगे। पिछले महीने भी हॉकिंग ने चेताया था कि तकनीकी विकास के साथ मिलकर मानव की आक्रामकता ज्यादा खतरनाक हो गई है। यही प्रवृति परमाणु या जैविक युद्ध के जरिए हम सबका विनाश कर सकती है। एक वैश्विक सरकार ही हमें इससे बचा सकती है। मानव बतौर प्रजाति जीवित रहने की योग्यता खो सकता है।
हॉकिंग की सोच अभी वैश्विक सरकार तक ही पहुंची है लेकिन भारत की परंपरा हजारों सालों से वैश्विक परिवार को ओर इशाऱा कर रही है। भारत का मानव व्यवहार दर्शन कहता है कि जब तक मानव खुद का अध्ययन नहीं करेगा, खुद को नहीं जानेगा वो दुनिया के किसी भी ज्ञान को पूर्णता के साथ ग्रहण ही नहीं कर सकता है।
इशोपनिषद कहता है कि मानव इस धरती पर सबसे पूर्ण और महत्वपूर्ण इकाई है और इस पूर्णता को समझकर, पूर्णता में शामिल हुए बिना उसकी ये यात्रा पूरी नहीं हो सकती।
“पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”
इस दर्शन को विज्ञान की दृष्टि से जानने की जरूरत है।
भारत का दर्शन कहता है मानव शरीर को अपनी जरूरतों के लिए बहुत ज्यादा सुविधा और साधनों की जरूरत नहीं है, लेकिन भौतिक विज्ञान ने पूरी ताकत सुविधा और साधनों को जुटाने में लगा दी, विज्ञान ने अपनी सबसे बड़ी ताकत  बाजारवाद में झोंक रखी है और इस लक्ष्यविहीन और दिशाविहीन प्रगति ने हमें ग्लोबल वार्मिंग की ओर धकेल दिया।
जो यूरेनियम धरती में हजारों फुट गहरे दबा था, जिसकी रेडियो एक्टिवता का असर ये है कि मानव जाति की नस्ल ही खत्म हो जाये, उसे दुनिया के तथाकथित समृद्ध और ताकतवर देशों ने परमाणु बम के तौर पर सजा रखा है। लेकिन उन देशों की इतनी हैसियत नहीं कि वो उसका इस्तेमाल कर सकें, क्योंकि उन्हें पता है जो करेगा वो मरेगा।
खुद पर इतराने वाला भौतिक विज्ञान अब मान रहा है कि धरती खतरे में है, मानव जाति खतरे में हैं। लेकिन भारत का दर्शन कहता है कि ना ये धरती खत्‍म होगी, ना अस्तित्व खत्म होगा। जिस अस्तित्व ने इसे बनाया है, उसे इस अस्तित्व को संभालने का हुनर भी आता है।
लेकिन ये अस्तित्व अपने तरीके से इस धरती को बचाये, इससे अच्छा होगा कि उससे पहले मानव अपनी भूमिका जान ले, समझ ले और सुधर जाये। विज्ञान को प्रकृति के अध्ययन में इस्तेमाल करे ना कि उसके विनाश में। हॉकिंग की चेतावनी को हल्के में लेने की गलती ना करें।
इस लेख को मध्यमत ने भी प्रकाशित किया - (http://www.madhyamat.com/we-have-to-reinvent-the-humanbeing-to-save-earth/)