Wednesday, April 19, 2017

नोटबंदी से भी बड़ा और कड़ा है ये फैसला

लाल बत्ती गुल,  बजा लोकतंत्र का बिगुल

आपको को जनता ने चुना था, आपने जनता से सेवा का वादा किया था, हाथ जोड़- जोड़ कर, पैर पकड़-पकड़ कर  आपने अपने लिए वोट मांगा  । जनता को आपने  भरोसा दिया है कि आपकी ये विनम्रता दिखावटी नहीं, शाश्वत रहेगी। 

जनता के हर दुख में आपने साझेदारी का संकल्प लिया । जनता में अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए आपने धर्म, मजहब, जात-पात धन-दौलत, ऊंच-नीच, अगड़ा-पिछड़ा, प्रांत-भाषा जहां जिससे जैसी बात बने उसे वैसे लुभाया । 

आप चुनाव जीते, किस्मत से मंत्री बने, आपको सुरक्षा मिली, सेवा करने और सेवक बनने का वादा किया था लेकिन आप तो हमारे सरकार ही बने बैठे और  आपके सिर पर लपलपाती ये लाल बत्ती उसी ठगी का बरसों से प्रतीक बनी रही । पहली बार किसी ने इतने ताकतवर तबके पर करारी चोट की है । 

पिछले 70 सालों में हमने पाया कि इस लालबत्ती में दम होता इसे लगाने वालों की पूजा होती, लोग अपने बच्चों को इन लालबत्तीवालों जैसा बनने का उदाहरण देते । लालबत्तीवालों के पीछे लोग स्वार्थवश घूमते रहे लेकिन इस वर्ग ने इसे श्रद्दा समझ लिया । लालबत्ती के दम पर जनता को शक्तिशाली होना था लेकिन इस लालबत्ती के चक्कर में जनता की बत्ती गुल रही । लोकतंत्र के नाम पर सामंती स्वरूप को इस लालबत्ती ने जिंदा रखा।  

लाल बत्ती हटाने का मोदी का ये फैसला नेता-अफसरों की इस गठजोड़ पर करारी चोट है जो इस सिस्टम पर कुंडलीमार कर बैठे है और इन लोगों ने ऐसा मकड़जाल बुन रखा है कि परेशान जनता सालों से इसमें फंसती रही और ये उससे अपना पोषण करते रहे । 

जिस तरह नोटबंदी से कालेधन के कुबेर बौखलाये हैं उससे ज्यादा अब हलचल होगी क्योंकि किसी ने पहली बार लालफीताशाही के सुरक्षित किले में सेंध मारी है । सफेदपोशों के गुरूर को चूर किया है । 

अभी तो ताकत के उन्माद का प्रतीक टूटा है,  अहंकार से निपटना अभी बाकी है । जनता के सेवकों को आईना दिखाने के लिए धन्यवाद मोदीजी!        


Tuesday, April 18, 2017

आईपीएल 2017 - मनन बने मिसाल

आईपीएल 2017  में सोमवार का दिन अब तक का सबसे रोमांचक दिन साबित हुआ । किंग्स इलेवन पंजाब के मनन वोहरा ने 190 के स्ट्राइक रेट से बल्लेबाजी की । 50 गेंद में 95 रन ठोक दिये । इस दौरान उन्होंने 9 चौके और 5 छक्के लगाये । अकेले अपने दम पर उन्होंने मैच को उस मुकाम पर पहुंचा दिया था जहां से सनराईजर्स हैदराबाद की टीम लगभग ये मैच गवां ही चुकी थी । 159 का पीछा करते हुए, मरे हुए मैच में मनन ने अपनी आतिशी पारी से जान फूंक दी । लेकिन पारी के 19 वें ओवर में भुवनेश्वर की कुमार की एक लो फुल टॉस गेंद पर मनन का बल्ला गेंद की रफ्तार को भांप नहीं पाया और गेंद सीधे उनके पैड से जा टकरायी । इस घटना पर हर क्रिकेट फैन के दिल से बस एक ही बात निकली कि काश! बल्ले ने थोड़ा संयम बरता होता या भुवी की गेंद थोड़ी ठहर जाती । लेकिन क्रिकेट में कहते है ना गेंद से ज्यादा बेहरम चीज कुछ नहीं होती । बस वो इंतजार करती है बल्लेबाज की एक गलती का और फिर बड़े से बड़ा पहाड़ रेत की तरह भरभरा जाता है । मनन के साथ बिलकुल यही हुआ उन्होंने अकेले अपने दम पर जीत का पहाड़ खड़ा कर दिया था, उम्मीदों का हिमालय उनके कदमों में था, शिखर पर पहुंच कर मनन जीत झंडा गाड़ने ही वाले थे कि हिमायल में हिमस्खलन हो गया और किंग्स इलेवन पंजाब की टीम मैच हार गई । 
लेकिन मनन की ये कहानी उस पर्वतारोही की तरह आनेवाले कई सालों तक क्रिकेटरों की प्रेरणा देती रहेगी जिसके सफर को बर्फ की आंधियां कभी डरा नहीं सकती  वो सिर्फ ये जानता है कि मौत किसी भी हो सकती है लेकिन रूकना नहीं है ।

Monday, April 17, 2017

सोनू निगम के लिए समाधान खोजें समस्या ना बनाये

जाने-माने गायक सोनू निगम ने सोमवार सवेरे अपने ट्वीट से सोशल मीडिया पर बवाल मचा दिया. उन्होंने लिखा, ''ऊपरवाला सभी को सलामत रखे. मैं मुसलमान नहीं हूं और सवेरे अज़ान की वजह से जागना पड़ता है. भारत में ये जबरन धार्मिकता कब थमेगी.''
सोनू के इस ट्वीट को धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक लोग अगर विवाद की दृष्टि से देखेंगे तो विवाद ही होगा ।  लेकिन अगर  धर्म की दृष्टि से देखेंगे तो आत्मअवलोकन का अवसर मिलेगा । इसलिए हमारे धर्मगुरूओं को सबसे पहले खुद के सामने प्रश्नों की झड़ी लगानी होगी । ये सवाल पहली बार सोनू निगम ने खड़ा नहीं किया, हिंदू, मुसलमान और तमाम धर्मों में लोगों ने समय- समय पर धर्म के नाम पर होने वाले दिखावे और आडम्बर पर प्रहार किया है  और मेरी समझ के मुताबिक रूढ़िवादी मान्यताओं के सामने सवाल खड़ा करने का ये सिलसिला संत कबीर दास जी ने बड़ी ही बहादुरी से शुरू किया था  वो लिखते हैं -
"कंकर पत्थर जोरि के मस्जिद लयी बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।"
कबीर दास जी ने इस मामले में हिंदुओं को भी नहीं छोड़ा
"पाहन पुजे तो हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़
ताते तो चाकी भली, पीस खाए संसार "
कितनी गहरी और सच्ची बात है । लेकिन फिर भी हमने कबीर के इस दर्शन को समझने की कोशिश ही नहीं की । हम उन्हीं जड़ परंपराओं को पकड़े रहे और वक्त के साथ जिस धर्म को मानवतावादी होना था । संपूर्ण अस्तित्व के संदर्भ में होना था वैसा  नहीं हुआ  बल्कि धर्म दिन ब दिन और जटिल होता गया । जैसे -जैसे मानव का विकास हुआ वैसे वैसे हमें अपने धर्म का भी विकास करना था । धर्म के नाम पर इंसान ने हजारों भव्य मंदिर- मस्जिद बना लिए लेकिन आजतक किसी को राम नहीं बना सके । किसी को अल्लाह का सच्चा बंदा नहीं बना सके ।
सोचिए हर दिन मोबाइल का एक नया वर्जन आ जाता है , गाड़ी का नया मॉडल हर छह महीने में नया आ जाता है ।सुख सुविधाओं की तमाम वस्तुएं हर दिन  बेहतर हो रही है । लेकिन जो धर्म हमें सुख देता है,  शांति देता है,  सदभाव देता है हमे अभावमुक्त करता है,  एक मानव का दूसरे मानव से शिकायत मुक्त करता है उस धर्म को वक्त के साथ हमने कितना सुधारा ? मानवीय दृष्टिकोण से उसे कितना बेहतर किया ? धर्म को हमने अपने अहंकार और पहचान से इस कदर जोड़ लिया है कि जो धर्म हमारे जीने का आधार होना चाहिए वो जड़ वस्तु बन कर रह गयी । हम ईश्वर के उपदेशों को सिर्फ सुनते रह गये लेकिन उसे समझ कर अपने जीवन में उतार नहीं सके ।
अगर आप हिंदू और मुसलमान के अहंकार से ऊपर उठ कर खुद को उस ईश्वर और अल्लाह के बंदे के स्थान पर रखकर सोचेंगे तो समझ आएगा की कोई धर्म किसी को भी शिकायत का अवसर नहीं देता । तो सोनू की ये शिकायत सिर्फ मुसलमानों के लिए ही नहीं  बल्कि तमाम धर्मों को भी आत्मअवोलन के लिए मजबूर करती हैं । सोनू निगम के लिए समाधान खोजें इसे समस्या ना बनाये ।